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तीन वर्षों से बंद पड़ा है जलमीनार, पेयजल के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं ग्रामीण आदिम जनजाति के दस परिवार* 

*तीन वर्षों से बंद पड़ा है जलमीनार, पेयजल के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं ग्रामीण आदिम जनजाति के दस परिवार*

 

*अबुआ राज में ग्रामीणों को एक किलोमीटर दूर स्थित मधुबन आदिवासी टोला से लाना पड़ रहा है पीने का पानी*

 

*मसलिया(दुमका)*

 

*रिपोर्ट – कुमार विक्रम*

 

मसलिया प्रखंड अंतर्गत मधुबन पहाड़िया टोला में पेयजल संकट एक गंभीर समस्या बन चुकी है। कल्याण विभाग द्वारा सात वर्ष पूर्व लगभग 20 लाख रुपये की लागत से सोलर आधारित जलमीनार का निर्माण कराया गया था, जो मात्र चार वर्षों तक ही सुचारु रूप से चला। बीते तीन वर्षों से यह जलमीनार पूरी तरह बंद पड़ा है, जिससे आदिम जनजाति परिवारों को पेयजल के लिए भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

 

स्थानीय निवासी भुवनेश्वर पुजहर, राजेश पुजहर, पूरण पुजहर और उर्मिला देवी ने बताया कि टोला में कुल 10 आदिम जनजातीय परिवार रहते हैं। यहां केवल एक चापाकल है, जो गर्मियों के मौसम में सूख जाता है। मजबूरन ग्रामीणों को एक किलोमीटर दूर स्थित मधुबन आदिवासी टोला से पीने का पानी लाना पड़ता है। ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि जलमीनार के काम करने के दौरान पानी की कोई समस्या नहीं थी, लेकिन अब यह केवल एक अनुपयोगी ढांचा बनकर रह गया है।

टोला में एक छोटा तालाब और दो डोभा भी हैं, जिनसे ग्रामीण नहाने और मवेशियों के लिए पानी का उपयोग करते हैं, लेकिन पीने योग्य पानी की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है।

 

ग्रामीणों का आरोप है कि विभागीय उदासीनता के कारण जलमीनार की मरम्मत नहीं करवाई गई है। इससे सरकार की आदिवासी उत्थान योजनाओं की वास्तविकता पर सवाल उठने लगे हैं।

टोला वासियों ने कल्याण विभाग से शीघ्र हस्तक्षेप कर जलमीनार की मरम्मत या एक नए कूप की व्यवस्था की मांग की है, ताकि उन्हें दैनिक जीवन के लिए पानी की मूलभूत सुविधा मिल सके।

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