*एसकेएमयू के संताली प्रध्यापकों द्वारा ओलचिकी लिपी के विरोध की सार संगठन ने की कड़ी भर्त्सना, जताया आक्रोश*
*झारखंड सरकार से राज्य में ओलचिकी लिपि को अविलंब संताली भाषा की अधिकारिक लिपि घोषित करने की मांग*
*दुमका*
*ब्यूरो रिपोर्ट*
सोमवार की देर शाम परिसदन दुमका में संताल एसोसिएशन फॉर अवेर्नस एण्ड रिफार्म(सार) की अतिआवश्यक बैठक बुलाई गई| बैठक में सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय दुमका में कार्यरत संताली विभाग के संताली प्रध्यापकों द्वारा ओलचिकी लिपी के विरोध को लेकर कड़ी भर्त्सना करते हुए आक्रोश व्यक्त किया गया|बैठक में सार संगठन से भारत एवं विदेश से जुड़े सदस्यों ने कहा कि जब भारत सरकार संताली भाषा के लिए ओलचिकी लिपी को पूर्ण रूप से संताली भाषा की अधिकारिक लिपि मानती है तो फिर इस प्रकार से विरोध करने का कोई औचित्य नहीं है|
ओलचिकी लिपी का विरोध भारत सरकार के संवैधानिक आदेश का घोर उल्लंघन है| प्रध्यापकों का यह कहना कि ओलचिकी लिपी के प्रयोग से संताल समाज सौ वर्ष पीछे हो जाएगा,यह विरोध में सम्मिलित लोगों की अज्ञानता को दर्शाता है और इस बहस का कोई मतलब नहीं है|संविधान द्वारा आठवीं अनुसूची में सम्मिलित संताली भाषा को भारत की सारी संवैधानिक संस्थाएं जब ओलचिकी को अंगीकृत कर संताली भाषा में संचार हेतु उपयोग कर रही है तो फिर इस प्रकार से विरोध स्वरूप व्यक्तिगत विचारों को ब्यक्त करने से उक्त प्राध्यापकों को परहेज करना चाहिए था|सार के सभी सदस्य मानते हैं कि कुछ संताली प्रध्यापकों द्वारा ओलचिकी लिपी का विरोध इनके व्यक्तिगत विचार है एवं
संताल परगना में संताल बाहुल्य समर्थकों के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते|
सार संगठन के सभी सदस्यों का स्पष्ट रूप से मानना है कि ओलचिकी लिपी का विरोध करना निःसंदेह विशेषकर संताल परगना के इच्छुक नागरिकों, छात्र-छात्राओं के एक बड़े वर्ग को ओलचिकी लिपी से वंचित करने के समान होगा| जिसके कारण आने वाले वर्षों में यहां की एक बड़ी युवा आबादी विशेषकर संताली भाषा एवं साहित्य में ओलचिकी लिपि द्वारा आने वाले अवसरों को खो देंगी| संताली भाषा की अधिकारिक ओलचिकी लिपि पर प्रश्न चिन्ह लगाने या विरोध को सार के भारत और विदेश में रह रहे समस्त संताल सदस्यों को कतई स्वीकार नहीं है|जिस तरह संताली भाषा की ओलचिकी लिपि के संरक्षण, सम्मान एवं सर्वांगीण विकास हेतु भारत सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार, ओडिशा सरकार व असम सरकार ने काम किया है उनको सार संगठन कृतज्ञता, आभार एवं धन्यवाद ज्ञापित करता है|
सार इस विषय पर झारखंड सरकार से झारखंड में ओलचिकी लिपि को अविलंब संताली भाषा की अधिकारिक लिपि घोषित करने की मांग करता है| बैठक में मुख्य रूप से चंद्रनाथ हेम्ब्रम, डॉ बिमल मरांडी, डॉ सुजीत कुमार सोरेन, डॉ ईश्वर मरांडी, सुनील मुर्मू, इंद्रजीत हेम्ब्रम समेत अन्य सदस्य मौजूद थे|
