*खुलासा: गर्म होती पृथ्वी पर बड़ा खतरा!भूमि और पेड़ों ने नहीं सोखा कार्बन, समुद्र से भी चेतावनी के संकेत*
*नई दिल्ली*
*ब्यूरो रिपोर्ट*
रोजमर्रा में उत्सर्जित होने वाले कार्बन को सोखना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। भूमि सतह पर मौजूद कार्बन को सोखती है, तो पेड़ वायुमंडल में और समुद्री जीव जल में मौजूद कार्बन प्रदूषण को सोखते हैं। हाल ही में हुए एक अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि पिछले साल पेड़ों और भूमि ने कार्बन डाइऑक्साइड को बिल्कुल भी नहीं सोखा।
विभिन्न शोध व अध्ययनों के आधार पर वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि पृथ्वी के धीरे-धीरे गर्म होने से कार्बन सोखने वाली प्राकृतिक प्रक्रियाएं टूट रही हैं। शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने पाया कि अब तक के सबसे गर्म वर्ष रहे 2023 में भूमि के कार्बन सोखने की मात्रा अस्थायी रूप से कम हो गई है। अंतिम परिणाम यह था कि वन, पौधे और मिट्टी लगभग बिल्कुल भी कार्बन नहीं सोख रहे। सितंबर में न्यूयॉर्क क्लाइमेट वीक में पोट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के निदेशक जोहान रॉकस्ट्रॉम ने कहा, हम पृथ्वी की प्रणालियों की लचीलापन में दरारें देख रहे हैं। स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र अपने कार्बन स्टोर और कार्बन सोखने की क्षमता खो रहे हैं, जो बेहद चिंताजनक है।
संकट यहीं नहीं थमा, समुद्र से भी चेतावनी के संकेत हैं। ग्रीनलैंड के ग्लेशियर और आर्कटिक की बर्फ की चादरें अपेक्षा से कहीं अधिक तेजी से पिघल रही हैं। इससे गल्फ स्ट्रीम महासागर की धारा बाधित हो रही है और महासागरों में कार्बन सोखने की दर धीमी हो रही है। शैवाल खाने वाले जूप्लैंकटन के लिए, पिघलती समुद्री बर्फ उन्हें ज्यादा धूप के संपर्क में ला रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये बदलाव उन्हें लंबे समय तक गहराई में रख सकता है, जिससे समुद्र तल पर कार्बन को संग्रहीत करने वाले ऊर्ध्वाधर प्रवास में बाधा आ सकती है।
*प्रकृति संरक्षण के बिना जीरो उत्सर्जन तक पहुंचना असंभव*
शोधकर्ताओं के मुताबिक, प्रकृति के बिना शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य तक पहुंचना असंभव है। बड़े पैमाने पर वायुमंडलीय कार्बन को हटाने में सक्षम तकनीक के बिना ऐसा करना मुमकिन नहीं है। 2023 में रिकॉर्ड 37.4 अरब टन तक पहुंचे कार्बन प्रदूषण को सोकने के लिए पृथ्वी के विशाल जंगल, घास के मैदान, पीट बोग और महासागर मानव कार्बन प्रदूषण को सोकने का एकमात्र विकल्प हैं।
*प्राकृतिक रूप से निकलता है लाखों टन कार्बन*
शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह रोज की प्रक्रिया है। रात शुरू होते ही अरबों जूप्लैंकटन, क्रस्टेशियन और अन्य समुद्री जीव सूक्ष्म शैवाल खाने के लिए समुद्र की सतह पर आते हैं। दिन निकलते ही ये गहराई में लौट आते हैं। इस उन्माद से उत्पन्न अपशिष्ट समुद्र तल पर डूब जाता है, जिससे हर साल वायुमंडल से लाखों टन कार्बन निकल जाता है।
यह गतिविधि उन हजारों प्राकृतिक प्रक्रियाओं में से एक है जो पृथ्वी की जलवायु को नियंत्रित करती हैं। महासागर, जंगल, मिट्टी और अन्य प्राकृतिक कार्बन सिंक मिलकर सभी मानव उत्सर्जन का लगभग आधा हिस्सा सोकते हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर के एंड्रयू वॉटसन ने कहा कि सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि दुनियाभर में बनाए जा रहे जलवायु परिवर्तन मॉडलों में इस समस्या का जिक्र ही नहीं है। हमें इन चुनौतियों का अध्ययन करना होगा और मानक तय करने होंगे। इन्हें जल्द ही जलवायु मॉडल में शामिल करना होगा तभी हम तय किए गए लक्ष्यों को हासिल कर पाएंगे।
