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*दुमका लोकसभा सीट पर झामुमो प्रत्याशी नलिन सोरेन व भाजपा प्रत्याशी सीता सोरेन के बीच कांटे की टक्कर*


*भाजपा व झामुमो की आमने-सामने की लड़ाई में समता पार्टी प्रत्याशी मुन्नी हांसदा की भूमिका भी अहम*

*दुमका*

*काठीकुंड ब्यूरो की रिपोर्ट*

  दुमका लोकसभा सीट के लिए सातवें चरण में 1 जून को मतदान होना है। चुनाव महापर्व को निष्पक्ष व सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में सम्पन्न कराने हेतु चुनाव आयोग ने तकरीबन सारी तैयारियां पूरी कर ली है, जिला निर्वाचन पदाधिकारी खुद पूरी प्रक्रिया पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।

बताते चलें कि दुमका लोकसभा अंतर्गत शिकारीपाड़ा विधानसभा क्षेत्र के काठीकुंड प्रखंड के शिवतला गांव में झामुमो प्रत्याशी नलीन सोरेन का पैतृक गांव है और समता पार्टी की प्रत्याशी मुन्नी हांसदा का भी काठीकुंड प्रखंड के बंदरपानी गांव में पैतृक आवास है,जबकि भाजपा प्रत्याशी सीता सोरेन झामुमो छोड़ कर भाजपा में शामिल हुई हैं।

  सीता सोरेन सोरेन परिवार की बड़ी बहू है, पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की भाभी व दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पुत्रवधू है जिसका लाभ मिलने से इंकार नहीं किया जा सकता। वें जामा विधानसभा से विधायक हैं।

  सभी प्रत्याशियों द्वारा क्षेत्र में जनसंपर्क अभियान तेज कर दिया गया है। हालांकि समता पार्टी की प्रत्याशी मुन्नी हांसदा का प्रभाव शिकारीपाड़ा विधानसभा तक सीमित माना जाता है।गौरतलब है कि शिकारीपाड़ा विधानसभा क्षेत्र झारखंड मुक्ति मोर्चा का गढ़ माना जाता है, तकरीबन सभी चुनावो में इस क्षेत्र में झामुमो को बढ़त मिलती रही है,इसी कारण झामुमो प्रत्याशी नलिन सोरेन इस विधानसभा से सात बार विधायक रहे हैं।

  शिकारीपाड़ा विधानसभा क्षेत्र में कुल 2,29,254 मतदाता प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला करेंगे।इस सबके बीच दुमका लोकसभा सीट पर मुख्य मुकाबला भाजपा प्रत्याशी सीता सोरेन और झामुमो प्रत्याशी नलिन सोरेन के बीच होना तय है, लेकिन कुछ प्रत्याशी ऐसे जरूर है जो किसी प्रत्याशी के जीत हार में अहम भूमिका निभा सकते है,उसमें एक नाम मुन्नी हांसदा का है।

  दुमका जिला के काठीकुंड प्रखंड के पंदानपहाडी पंचायत के बदरपानी गांव की रहने वाली मुन्नी हांसदा वर्ष 2019 में शिकारीपाड़ा विधानसभा क्षेत्र से तृणमूल पार्टी से चुनाव लड चुकी है। हांलांकि उस चुनाव में मुन्नी हांसदा को महज 2 हजार मत मिले थे। 

  मुन्नी हांसदा ने वर्ष 2010 में जिला परिषद सदस्य का चुनाव जीता था। इस बार मुन्नी हांसदा समता पार्टी से चुनाव लड़कर अपनी किस्मत अजमा रही हैं। मुन्नी हांसदा लगभग दो दशक से आदिवासी कल्याण परिषद के बैनर तले प्रत्येक गांव में ग्राम सभा सशक्तिकरण को मजबूत करने और जल जंगल जमीन की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ रही है।

  वर्ष 2007-2008 में मुन्नी हांसदा अचानक सुर्खियों में तब आईं जब काठीकुंड प्रखंड के आमगाछी -पोखरिया प्रस्तावित पावर प्लांट के विरोध में आंदोलन शुरू हुआ| मुन्नी हांसदा ने ही आंदोलन का नेतृत्व किया था। 6 दिसंबर 2008 को आंदोलनकारी और पुलिस के बीच बड़तल्ला मोड़ के पास हिंसक झडप हुई,जिसमें पुलिस की ओर से गोली चलीं तो आंदोलनकारियों की ओर से तीर चला।

  बाद में कंपनी को पावर प्लांट को छोड़कर वापस जाना पड़ा, तभी से मुन्नी हांसदा जल,जंगल और जमीन की रक्षा के लिए चलाए जा रहे आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रही है। वर्तमान में मुन्नी हांसदा शिकारीपाड़ा विधानसभा क्षेत्र में ईसीएल समेत कई कोल कंपनियों के विरोध का नेतृत्व कर रही है।

  काठीकुंड और शिकारीपाड़ा प्रखंड में कोल ब्लॉक आवंटित हुआ है, सभी कंपनी  ज़मीन अधिग्रहण के लिए प्रयासरत हैं। लेकिन मुन्नी हांसदा रैयतों के साथ कंपनी के विरोध में आगे आकर रैयतों के मन में जगह बना चुकी है। मुन्नी हांसदा चुनाव लड़ने से किस प्रत्याशी को फायदा होगा और किसको नुकसान होगा यह बड़ा सवाल है।

यदि देखा जाए तो झामुमो भी जल, जंगल और जमीन की रक्षा को चुनावी मुद्दा बनातीं रही है। झामुमो प्रत्याशी नलीन सोरेन शिकारीपाड़ा विधानसभा से सात बार चुनाव जीत कर विधायक हैं। समता पार्टी की प्रत्याशी मुन्नी हांसदा गांव गांव घुम – घुमकर रैयतों के आंदोलन को धार दे रही है, वैसे इस मुद्दे पर नलिन सोरेन भी कह चुके हैं कि वे रैयतों के साथ है।

  इसके बावजूद भी उक्त मामले में मुन्नी हांसदा को ज्यादा प्रभावी माना जाता है। मुन्नी हांसदा और झामुमो का चुनावी मुद्दा जल, जंगल, और जमीन है,ऐसी स्थिति में राजनीतिक जानकारों के अनुसार मुन्नी हांसदा का जो भी वोट मिलेगा, उससे झामुमो को प्रत्यक्ष रूप हानि होने की संभावना जताई जा रही है और अप्रत्यक्ष रूप से इसका लाभ भाजपा को होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

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